महामारी के बाद झारखंड के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं। जहाँ पर नब्बे फीसदी से अधिक मूलनिवासी समाज के बच्चे पढ़ते हैं। आंकड़ो के अनुसार महामारी के बाद बच्चे पढ़ना-लिखना भूल गए हैं। साथ ही स्कूलों में उपस्थिति भी कम हुई है । इसके अलावा इन स्कूलों में शिक्षकों की कमी के साथ साथ पानी, बिजली जैसी सुविधाओ का भी अभाव हैं।
वैश्विक महामारी यानी कोविड-नाईन्टीन के प्रभाव से पूरी दुनिया प्रभावित थी। लेकिन गलत फैसलों के वजह से इसका सबसे बुरा प्रभाव भारत में ही पड़ा। खास कर स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर। जिससे आज तक उभरा नहीं गया हैं।
झारखंड राज्य की बात करें तो यहाँ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की स्थिति बेहद चिंताजनक हैं। झारखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग नब्बे फीसदी विद्यार्थी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग से आते हैं।
एक सर्वे के मुताबिक, वंचित और आदिवासी बच्चे शिक्षा विभाग द्वारा असहाय छोड़ दिए गए हैं। स्कूल दो साल बंद रहे, लेकिन बच्चों के लिए कुछ नहीं किया गया। महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा केवल मज़ाक बन कर रह गई, क्योंकि सरकारी स्कूलों में सतासी प्रतिशत छात्रों की पहुंच स्मार्टफोन तक नहीं थी।
इसके अलावा सरकारी स्कूलों में बच्चो की उपस्थिति भी घटी हैं। ‘स्कूल में भूल’ नामक एक सर्वे के मुताबिक, कोविड-नाईन्टीन महामारी के बाद झारखंड के स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति घटी हैं । जिनमे उच्च प्राथमिक स्तर के स्कूल यानी छठी से आठवीं तक की कक्षाओं में बच्चो की संख्या घटकर अंठावण प्रतिशत और प्राथमिक विद्यालयों में यानी पहले से पांचवे कक्षाओं में यह आंकड़ा कम होकर अड़सठ प्रतिशत रह गई हैं।
अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वेक्षण में तिरपन प्रतिशत शिक्षकों ने यह स्वीकार किया है कि महामारी के बाद स्कूलों के खुलने पर छात्र पढ़ना और लिखना भूल गए थे।
यह रिपोर्ट राज्य सरकार द्वारा संचालित कुल सौलह जिलों के एक सौ अड़तीस प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के सर्वेक्षण पर आधारित है। जो दो हजार बाईस के सितम्बर-अक्टूबर महीने में तैयार किया गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकतर सरकारी स्कूल पारा शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। आंकड़ो की माने तो प्राइमरी स्तर पर ज्यादातर पारा शिक्षकों की संख्या हैं। इन स्कूलों में लगभग पचपन फीसदी पारा शिक्षक हैं। जबकि अपर-प्राइमरी स्तर पर लगभग सैंतीस प्रतिशत पारा शिक्षक हैं। वही झारखंड के लगभग चालीस प्रतिशत प्राइमरी स्कूल पूरी तरह से पारा शिक्षक ही चला रहे हैं।
सर्वे में यह बात भी सामने आई हैं कि जहा मिड डे मील में हर हफ्ते दो दिन अंडे दिए जाने चाहिए वहाँ सिर्फ एक दिन दिया जा रहा हैं। यही नहीं अधिकांश शिक्षकों ने कहा कि स्कूल के पास मिड-डे मील के लिए पर्याप्त धन नहीं है ।
इस सर्वे के मुताबिक झारखंड के अधिकांश सरकारी स्कूलों में शौचालय, बिजली या पानी की सुविधा नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लगभग छियासठ प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में चारदीवारी नहीं थी और चौसठ प्रतिशत में खेल का मैदान नहीं था और लागभग सैंतीस प्रतिशत स्कूलों में लाइब्रेरी की किताबें नहीं थीं।
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